⇐⇏एक समय की बात हे, एक
आदमी कही जा रहा था, चलते
चलते उसे एक आम का बगीचा दिखाई दिया, बगीचे
में । आम के पेड़ो का एक विशाल समूह था जिस पर ताजे और मोठे आम ही आम लगे हुए थे।
आम के मोटे और ताजे आम को देखकर उसे उन आम को
पाने के जिज्ञाषा हुई। उस आदमी ने आम खाने की जिज्ञासा में बगीचे में जाने का निश्चय किया और पेड़ो के पास जाकर आम को तोड़ने
लगा और कुछ आम उसने तोड़े और उन खाने लगा ।
इसे दौरान आम के बगीचे के मालिक ने ये सब कुछ
देखा और अपने साथ एक लाठी लेकर, दबे
पाव उस आदमी के पीछे से आया. -फिर
उसने आदमी को लाठी से पीटने लगा, बगीचे
के मालिक ने ८-१० लाठी आदमी की पीठ पर जड़ दिए और आदमी बहुत जोर से चिलाय और वह से
भाग निकला ।
अब कहानी के सार पर आते हे:-
हम सभी जानते हे की उस आम को उस आदमी ने नहीं
बल्कि उसकी आखो ने देखा था परन्तु आखे तो उस आम के पेड़ के पास नहीं जा सकती , पेड़
के पास आदमी के पैर चलकर गए परन्तु पैर भी तो उस आम को नहीं तोड़ सकते , आम को
तोडा उसके हाथो ने परन्तु हाथ तो फल का स्वाद नहीं ले सकते , आम का
स्वाद उसकी जीभ ने लिया परन्तु जीभ भी तो उसके रस को नहीं रख राकी अपने पास , उसके
रस को रखा पेट ने अपने पास।
इसका मतलब हे जिसने देखा वो गया नहीं और जो गया
उसने थोड़ा नहीं और जिश्ने तोडा उसने चखा नहीं और जिसने चखा उसने रखा नहीं ।
परन्तु लाठी पीट को साहनी पड़ी जबकि उसका कुछ लेना
देना नहीं था , अंत
में दर्द हुआ और आशु निकले आखो से ।
अर्थात :- हमारे सरीर के जिस भी अंग से इच्छा
होगी उसी को उसका फल उसी अंग को मिलके ही रहता हे यही काम का विधान हे।
सोच समझ कर ही इच्छा करनी चाहिए नहीं तो अंत में
पछताना ही पड़ता हे ।
विशेष पहलु :-
हमारा हाथ और पैर कभी गलत काम और गलत जगह नहीं
जाते परन्तु सारा खेल तो इन आखो और जीभ का हे जिसके लिए हम इनका उपयोग करते हे ।
ये दुनिया दिखावे की जो हे ।
धन्यवाद्
⇐⇏एक समय की बात हे, एक
आदमी कही जा रहा था, चलते
चलते उसे एक आम का बगीचा दिखाई दिया, बगीचे
में । आम के पेड़ो का एक विशाल समूह था जिस पर ताजे और मोठे आम ही आम लगे हुए थे।
आम के मोटे और ताजे आम को देखकर उसे उन आम को
पाने के जिज्ञाषा हुई। उस आदमी ने आम खाने की जिज्ञासा में बगीचे में जाने का निश्चय किया और पेड़ो के पास जाकर आम को तोड़ने
लगा और कुछ आम उसने तोड़े और उन खाने लगा ।
इसे दौरान आम के बगीचे के मालिक ने ये सब कुछ
देखा और अपने साथ एक लाठी लेकर, दबे
पाव उस आदमी के पीछे से आया. -फिर
उसने आदमी को लाठी से पीटने लगा, बगीचे
के मालिक ने ८-१० लाठी आदमी की पीठ पर जड़ दिए और आदमी बहुत जोर से चिलाय और वह से
भाग निकला ।
अब कहानी के सार पर आते हे:-
हम सभी जानते हे की उस आम को उस आदमी ने नहीं
बल्कि उसकी आखो ने देखा था परन्तु आखे तो उस आम के पेड़ के पास नहीं जा सकती , पेड़
के पास आदमी के पैर चलकर गए परन्तु पैर भी तो उस आम को नहीं तोड़ सकते , आम को
तोडा उसके हाथो ने परन्तु हाथ तो फल का स्वाद नहीं ले सकते , आम का
स्वाद उसकी जीभ ने लिया परन्तु जीभ भी तो उसके रस को नहीं रख राकी अपने पास , उसके
रस को रखा पेट ने अपने पास।
इसका मतलब हे जिसने देखा वो गया नहीं और जो गया
उसने थोड़ा नहीं और जिश्ने तोडा उसने चखा नहीं और जिसने चखा उसने रखा नहीं ।
परन्तु लाठी पीट को साहनी पड़ी जबकि उसका कुछ लेना
देना नहीं था , अंत
में दर्द हुआ और आशु निकले आखो से ।
अर्थात :- हमारे सरीर के जिस भी अंग से इच्छा
होगी उसी को उसका फल उसी अंग को मिलके ही रहता हे यही काम का विधान हे।
सोच समझ कर ही इच्छा करनी चाहिए नहीं तो अंत में
पछताना ही पड़ता हे ।
विशेष पहलु :-
हमारा हाथ और पैर कभी गलत काम और गलत जगह नहीं
जाते परन्तु सारा खेल तो इन आखो और जीभ का हे जिसके लिए हम इनका उपयोग करते हे ।
ये दुनिया दिखावे की जो हे ।
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